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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

who is guilty?

कसूरवार कौन ? 


बात तब की है जब मै सिर्फ १२ साल का था | मै अपने जन्म स्थान, उत्तरप्रदेश के भदोही जिले में अपने माता-पिता के साथ रहता था | वही भदोही जो अपने कालीन निर्यात के लिए विश्व विख्यात है | मेरा परिवार एक संयुक्त परिवार है, जहाँ मेरे दादाजी अपने दो भाइयों और उनके पुरे परिवार के साथ रहते है | और मै खुद को इसीलिए सौभाग्यशाली समझता हूँ, और पुरे परिवार के साथ बिताये गए वो पल मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत और ताउम्र यादगार रहने वाले पल थे | मेरे दादाजी मुझसे बहुत स्नेह करते थे और एक वही थे जिनसे मै हठ करके अपनी बात मनवा लेता था | वे मुझे प्यार से ''बऊ'' बुलाते थे | मै हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभी जिद करके साईकिल से बाजार जाकर घर के लिए कुछ सामान ला लेता था | लेकिन उसके पीछे मेरा एक स्वार्थ छुपा हुआ था, जिस रहस्य को मै और मेरे दादाजी के सिवाय कोई नहीं जानता था, जब मै सामान लेन की जिद करता तो पहले तो दादाजी मनाकर देते लेकिन मेरे बालहठ के आगे वे भी कितने देर टिक पाते, और अंत में मुस्कुराते हुए मुझे पैसे देते हुए प्यार से कहते  - '' ठीक है चले जाओ, लेकिन संभल के जाना |''
और जब मै पैसे देखता तो उसमे सामान की तुलना में ज्यादा पैसे हुआ करते थे |

एक दिन मै सुबह उठा तो हल्की-हल्की  ठंढ लग रही थी, और मै घर के दरवाजे के पास बैठा था कि अचानक हल्के स्वर में पीछे से दादाजी की आवाज सुनायी दी - '' बऊ ! ''
मै अंदर गया तो अपने कमरे में लेते हुए थे | अंदर जाते ही उन्होंने मुझे पैसे देते हुए कहा - ''बाजार जाकर मेरा बिस्कुट लेकर आओ |''

मैंने पैसे लिए और जाने की लिए मुड़ा ही था की हमेशा की तरह उन्होंने हिदायत देते हुए कहा - ''आराम से जाना, और जल्दी वापस आ जाना |''

मैंने भी बिना उनकी तरफ देखे स्वीकृति से अपना सर हिला दिया | और सायकिल पर सवार होकर बाजार कि तरफ निकल पड़ा.

मैने बाजार पहूचकर जल्दी-जल्दी सामान लिया और वापस लौटने के लिए साइकिल उठायी ही थी की अचानक ही मेरा ध्यान सड़क के किनारे खड़ी एक महिला पर पड़ी, पास जाकर देखा तो अरे ये क्या यह तो रुक्मिणी बुआ है| इनकी हमारे गाँव मे एक छोटी सी दुकान है, और वे हमेशा पैदल ही बाजार जाकर समान लाती थी| लगता है आज उनका सामान का थैला कुछ ज़्यादा वज़नदार हो गया था जिसकी वजह से वे उसे नही ले जा पा रही थी| मैंने देखा तो वे मुझे ही देख रही थी, और वे मुझसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन कह नहीं पा रही थी । मुझे जल्दी थी, लेकिन मै खुद को रोक नहीं सका, और पास जाकर पूछा - '' क्या हुआ बुआ ?''

उन्होंने सकुचाते हुए कहा - ''नहीं....... कु........ कुछ नहीं ।''

लेकिन मेरे जोर देने पर उन्होंने बताया - '' सामान लेने आयी थी, लेकिन वजन ज्यादा होने के कारण नहीं ले जा पा रही हूँ ।''

तो मैंने कहा - ''ठीक है, मै लिए चलता हूँ ।''

तो वह मना करने लगी, लेकिन इससे पहले की वह कुछ बोल पाती मैंने उनका झोला (बैग) अपने केरियर (सायकिल का पिछला हिस्सा, जो वजनी सामान ढोने के काम में आता है) पर रख लिया। तो वह भी मान गयी और हम दोनों पैदल ही घर की तरफ चल दिये। हमारे घर से बाजार की दूरी तकरीबन दो किलोमीटर थी, इसीलिए पहुचने में लगभग एक घंटे का समय लग गया। और इस चक्कर में मै यह भूल गया की मुझे घर जल्दी जाना था। हम घर के करीब ही थे की सामने से छोटे चाचाजी आते दिखाई दिए।
और पास आकर उन्होंने पूछा - '' इतनी देर कैसे हो गयी ?, और पैदल क्यों आ रहे हो ?''

इससे पहले की मै कुछ बोल पाता, उन्होंने फिर क्रोधित होते हुए पूछा - ''यह सामान किसका है ? '' 

तो मैंने बताया की सामान तो रुक्मिणी बुआ का है और मेरे कुछ और बोलने से पहले ही वह बुआ पर बिफर पड़े। उन्होंने कहा - ''तुम्हे इतनी भी समझ नहीं है, इस छोटे से बच्चे के ऊपर इतना सामान लाद दिया है ।''

और इतना कहकर उन्होंने रुक्मिणी बुआ का सारा सामान निचे फेक दिया, जो पुरे सड़क पर बिखर गया। मैंने चाचाजी को समझाने और रोकने की पूरी कोशिस की लेकिन उन्होंने मुझे डाँटकर चुप करा दिया, चुपचाप घर जाने के लिए कहा। मैंने एक असहाय सी नजरो से रुक्मिणी बुआ की तरफ देखा तो उनकी आखे सजल हो चुकी थे और कभी भी अश्रुधारा बह सकती है। वे नजरे झुकाये सड़क के किनारे खड़ी थी। चाचाजी ने न जाने उन्हें कितना बुरा-भला कहा, लेकिन वह सब चुपचाप सब सुनती-सहती गयी। और अंत में चाचाजी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर चल दिए, लेकिन रुक्मिणी बुआ तो अब भी वही खम्भे के सामान अविचलित सी खड़ी है। मेरी आँखे निरंतर उनको ही देखती रही, और खुद से काफी जद्दोजहद के बाद उनकी आँखों से आंसू निढाल हो गए। और धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से ओझल हो चुकी थी। मै खुद उस समय समझ नहीं पाया की कसूरवार कौन है ? - मै, बुआ, चाचाजी या कोई कसूरवार है भी की नहीं ?

इस घटना को आज तकरीबन आठ साल बीत चुके है, और शायद वह भी इस घटना को भूल चुकी थी, लेकिन आज भी जब-जब रुक्मिणी बुआ मेरे सामने आती है, तो मेरी नजरो के सामने वो मंजर चलचित्र की भाँती चल पड़ती है। उन्हें मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रही और ना ही उन्होंने किसी से इस घटना का जिक्र किया शायद इसीलिए मेरा अपराध बोध बढ़ जाता है। उस घटना के बाद मै उनसे ठीक से आँखे मिलाकर बात भी नहीं कर पाता हूँ। जब आज मै यह सच्ची घटना से आप सब को रूबरू कराने जा रहा हूँ, खुद से यही सवाल कर रहा हूँ की कसूरवार कौन ?

गुरुवार, 29 मार्च 2018

Laxmirangam: वर्तमान शिक्षा प्रणालीभाषा देखें : घ...

Laxmirangam: सरकारों को चाहिए कि BE, MBBS, CA, ICWA, Ph.D  व भाषा विशारद जैसे क्षेत्रों में छात्रों को भेड़ बकरियों सा आभास मत दीजिए, उनमें गुणवत्ता लाइए. कम से कम शिक्षण के क्षेत्र में भ्रष्टाचार पूरी तरह से बंद करवाइए. जितनी नौकरियाँ उपलब्ध करा पाते हैं, उसी अनुपात में शिक्षा को भी नियंत्रित कीजिए. बेरोजगार पैदा मत करते जाईए.


अच्छी गुणवत्ता के साथ हमारे विज्ञों को बाहर परदेश जाने दीजिए .. मत रोकिए, ब्रेन ड्रेन के नाम पर. मत पीटिए सर कि आई आई टी से पढ़कर बच्चे देश की सेवा करने की बजाए अमेरिका जैसे देशों में सेवा देते हैं. क्या करेंगे बच्चे, यदि देश में उचित नौकरी उपलब्ध न हो तो ?

अधिकारियों को चाहिए कि वे इन समस्याओँ पर ध्यान दे. शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कुछ करें. परीक्षा बिना लिए लिए बच्चे को पाँचवीं तक निरक्षर बनाकर रखना किसी मुर्खता पूर्ण निर्णय से कम नहीं है. शिक्षको को अपनी नौकरी के लिए इतनी सुविधाएं दें कि वे इसे नौकरी नहीं समाज सेवा समझ सकें. वरना यह बेमतलब की शिक्षा व प्रणाली देश को डुबाने में पूरा सहयोग करेगी.

Laxmirangam: वर्तमान शिक्षा प्रणालीभाषा देखें : घ...

बुधवार, 14 मार्च 2018

चिड़िया: बाँसुरी

चिड़िया: बाँसुरी: बाँसुरी - 1- बाँस का इक नन्हा सा टुकड़ा, पोर - पोर में थीं गाँठें ! जीवित था पर प्राण कहाँ थे ? चलती थीं केवल साँसें !!! मन का मौजी,...

रविवार, 4 मार्च 2018

एक ग़ज़ल : ये कैसी रस्म-ए-उलफ़त है----

एक ग़ज़ल : ये कैसी रस्म-ए-उलफ़त है----

ये कैसी रस्म-ए-उलफ़त है ,न आँखें नम ,न रुसवाई
ज़माने को खटकता क्यों  है दो दिल की  पज़ीराई

तुम्हारे हाथ में पत्थर ,  जुनून-ए-दिल इधर भी है
न तुम जीते ,न दिल न हारा,नही उलफ़त ही रुक पाई

न भूला है ,न भूलेगा कभी यह आस्तान-ए-यार 
मेरी शिद्दत ,मेरे सजदों की अन्दाज़-ए-जबींसाई

तुम्हारे सितम की मुझ पर अभी तो इन्तिहा बाक़ी
कभी देखा नहीं होगा , मेरी जैसी शिकेबाई

तुम्हारी तरबियत में ही कमी कुछ रह गई होगी
वगरना कौन करता है मुहब्ब्त की यूँ  रुसवाई

कभी जब ’मैं’ नहीं रहता ,तो बातें करती रहती हैं
उधर से कुछ तेरी यादें ,इधर से मेरी तनहाई

हमारी जाँ ब-लब है ,तुम अगर आ जाते इस जानिब
यक़ीनन देखते हम भी कि क्या होती मसीहाई

मैं मह्व-ए-यार में डूबा रहा ख़ुद से जुदा ’आनन’
मुझे होती ख़बर क्या कब ख़िज़ाँ आई ,बहार आई 

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
पजीराई =चाहत ,स्वीकृति ,मक़्बूलियत
आस्तान-ए-यार = प्रेमिका के देहरी का चौखट/पत्थर
अन्दाज़-ए-जबींसाई = माथा रगड़ने का अन्दाज़./तरीक़ा
शिकेबाई      =धैर्य/धीरज/सहिष्णुता
तरबियत =पालन पोषण 
जाँ-ब-लब =मरणासन्न स्थिति
मह्व-ए-यार = यार के ध्यान में मग्न /मुब्तिला

गुरुवार, 1 मार्च 2018

होली पर एक भोजपुरी गीत---

होली पर एक ठे भोजपुरी गीत रऊआ लोग के समने--अशीरवाद चाही ]
होली पर सब मनई लोगन के हमार बधाई बा
--------होली पर एक भोजपुरी गीत-----------

कईसे मनाईब होली ? हो राजा !
कईसे मनाईब होली ........
आवे केS कह गईला अजहूँ नS अईला
न ’एसमसवे" भेजला नS पइसे पठऊला
पूछा नS कईसे चलाईला खरचा-
तोहरा का मालूम? परदेसे रम गईला
कईसे सजाईं रंगोली , हो राजा !
कईसे सजाईं रंगोली......
मईया के कम से कम लुग्गा तS चाही
’नन्हका’ छरिआईल बा जूता तS चाही
मँहगाई मरले बा कि आँटा बा गीला-
’मुनिया’ कs कईसे अब लहँगा सियाई ?
कईसे सियाईं हम चोली ? हो राजा !
कईसे सियाईं चोली....
’रमनथवा’ मारे ला रह रह के बोली
’कलुआ’ मुँहझँऊसा करेला ठिठोली
पूछेलीं गुईयां सब सखियाँ सहेली
अईहैं नS ’जीजा’ का अबकीओ होली?
खा लेबों जहरे कS गोली, हो राजा !
खा लेबों जहरे कS गोली........
अरे! कईसे मनाईब होली हो राजा..कैसे मनाईब होली
-आनन्द.पाठक
एसमसवे = S M S ही

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

Laxmirangam: जिद

Laxmirangam: जिद: जिद जायज न हो शायद तुझे दोष देना कन्हैया, मगर मैं तो मजबूर हूँ. तुम्हारे किए का हरजाना देने, मैं कब तक सहूँ, मैं कब तक मरूँ...