मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

सोमवार, 22 अगस्त 2016

क्यों नहीं जीत पाये हम ओलंपिक स्वर्ण पदक
फिर एक बार अंतर्राष्ट्रीय खेलों में हमारा प्रदर्शन निराशाजनक रहा. एक रजत और एक कांस्य पदक पाकर भारत ने ओलंपिक पदक तालिका में ६७ स्थान पाया है.
हर बार की भांति इस मुद्दे पर खूब बहस होगी, शायद कोई एक-आध  कमेटी भी बनाई जाये. लेकिन आशंका तो यही है कि चार वर्षों बाद, टोक्यो ओलंपिक  की समाप्ति पर, हम वहीँ खड़े होंगे जहां आज हैं.
कई कारण हैं कि हम लोग खेलों में कभी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये. खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं की कमी है, अच्छे कोच नहीं हैं, जो बच्चे व युवक-युवतियां खेलों में आगे बढ़ने का साहस करते भी हैं उन के लिए जीविका का प्रश्न सामने आकर खड़ा हो जाता है. अधिकतर स्पोर्ट्स एसोसिएशंस  के कर्ता-धर्ता वह लोग हैं जिनका खेलों से कोई भी नाता नहीं है.
पर मेरा मानना है कि अगर सुविधाओं में सुधार हो भी गया और अन्य  खामियों को भी थोड़ा-बहुत दूर कर दिया गया तब भी खेलों के हमारे प्रदर्शन में आश्चर्यजनक सुधार नहीं होगा.
किसी भी खेल में सफलता पाने के लिए दो शर्तों का पूरा करना आवश्यक होता है.
पहली शर्त है, अनुशासन. हर उस व्यक्ति के लिए, जो खेलों से किसी भी रूप में जुड़ा हो, अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होता है. दिनचर्या में अनुशासन, जीवनशैली में अनुशासन, अभ्यास में अनुशासन. अगर संक्षिप्त में कहें तो इतना कहना उचित होगा कि अपने जीवन के हर पल पर खिलाड़ी का अनुशासन होना अनिवार्य है तभी वह सफलता की कामना कर सकता है.
दूसरी शर्त है टीम स्पिरिट की भावना. अगर आप टीम के रूप में खेल रहें हैं तो जब तक हर खिलाड़ी के भीतर यह भावना नहीं होगी तब तक सफलता असम्भव है. और अगर कोई खिलाड़ी अकेले ही खेल रहा तब भी अपने कोच वगेरह के साथ एक सशक्त टीम के रूप में उसे काम करना होगा.
अब हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या तो यह ही है कि अनुशासन के प्रति हम सब का रवैया बहुत ही निराशाजनक है. एक तरह से कहें तो अनुशासनहीनता हमारे जींस में है. अगर हम वीआइपी हैं तो अनुशासन की अवहेलना करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार बन जाता है. अगर हम वीआइपी नहीं भी हों तब भी हम लोग अनुशासन के प्रति उदासीन ही रहते हैं. चाहे टिकट काउंटर पर कतार में खड़े होने की बात हो या समय पर दफ्तर पहुँचने की, चाहे सड़क पर गाड़ी चलाने की बात हो या फूटपाथ पर कूड़ा फैंकने की, अनुशासन की प्रति हमारा अनादर हर बात में झलकता है.
टीम स्पिरिट की भी हम में बहुत कमी है. घर में चार भाई हों तो वह भी मिलकर एक साथ नहीं रह पाते. किसी दफ्तर में चले जाओ, वहां आपको अलग-अलग विभागों ओर अधिकारियों में रस्साकशी चलती दिखाई पड़ेगी. पार्लियामेंट में जीएसटी बिल एकमत से पास हुआ तो उसे एक ऐतिहासिक घटना माना जा रहा है. अन्यथा जो कुछ वहां होता है वह सर्वविदित है.
अनुशासन और टीम स्पिरिट ऐसी भावनाएं हैं जो सुविधाओं वगेरह पर निर्भर नहीं हैं, यह एक समाज की सोच पर निर्भर हैं. जिस तरह जापान विश्वयुद्ध के बाद खड़ा हुआ वह उनकी सोच का परिचायक है. हाल ही में एक भयंकर सुनामी के बाद जो कुछ हुआ हम सबके लिए एक संकेत है. इस विपदा से त्रस्त हो कर रोने-धोने के बजाय सब लोग उससे बाहर उभरने के लिए एक साथ जुट गए.
क्या अगले चार वर्षों में अनुशासन की भावना हम में उपज जायेगी? क्या इन चार वर्षों में जीवन के हर क्षेत्र में हम एक टीम की भांति काम करना शुरू कर देंगे? ऐसा लगता नहीं. चार वर्षों बाद भी पदक तालिका में हम कहीं नीचे ही विराजमान होंगे, और हर टीवी पर चल रही गर्मागर्म बहस का आनंद ले रहे होंगे.

सोमवार, 8 अगस्त 2016

चरागों में ढूढ़ता है




 
चरागों में ढूढ़ता है रोशनी यारों।
ख़ुद से कितना दूर है आदमी यारों।।

क्यूं ख़याल इतना क्यूं तड़प इतना है।
बस चार दिन की है जिंदगी यारों।।

तेरा खुदा अलग है मेरा खुदा अलग।
ये किस तरह की है हमारी बंदगी यारों।।

चल मिलके एक दुनियां बनाते चलें।
जहॉ हो न हरगिज दुश्मनी यारों।।

मेरे मुख़ालिफ मेरे होने लगे हैं सब।
नज़्म की देखकर मेरे वानगी यारों।।

वो मिली भी तो उस मोड़ पर मिली।
बुझ गई जब दिल की तिस्नगी यारों।।

सच है की किसी ने मेरी खुशी लुटी।
मगर दे गई बदले में मौसिकी यारों।।


रविवार, 7 अगस्त 2016

🌹 तन्हाई 🌹

(एक किसान के जीवन में) 

जीवन सरीता में,  
                       डोले मेरी नैया क्युँ ?

तुमको हैं ,सुख का सागर, 
         मुझे खुशियों से किनारा क्युँ ?

धुप से लड़ता,मै,
                     रज कण बहाता हूँ |

तन चंदन घिसकर, 
           अस्तित्व तिलक लगता हूँ |

   देता सबको उजाला मैं, 
                मेरे जीवन में अंधियारा क्युँ |

जीवन सरीता मे, 
              डोले मेरी नैया क्युँ |

तुमको हैं सुख का सागर, 
           मुझे खुशियों से किनारा क्युँ |

मेरी तन्हाई की धरती पर, 
                      कहते हो तुम ,सुख की बरखा हो |

जब सब साथ है तुम्हारे, 
                                क्यो तुम घबराते हो ?

जब तुम थे ,साथ हमारे तो, 
                              जिंदगी मैने ठुकराई क्युँ ??

जीवन सरिता में ,
                           डोले मेरी नैया क्युँ ??

तुमको हैं सुख का सागर, 
                   मुझे खुशियों से किनारा क्युँ?? 

आँखों की बेटी से,
                  हुई   दुःख की सगाई है | 

सूख चले हैं आँसू, 
             आँखों में बसी बस अब तन्हाई है |

तन्हाई की दुनियां में, ए मालिक, 
                         मेरी बस्ती बसाई क्युँ ?

जीवन सरीता मे ,
              डोले मेरी नैया क्युँ ??

तुमको हैं सुख का सागर, 
         मुझे खुशियों से किनारा क्युँ ??

                     जी. एस. परमार 
........................9179236750.............
प्रतीक... 

तन चंदन घिसकर.... कड़ी मेहनत से 
अस्तित्व तिलक...... जीवित रहना 
म. उजाला...........        अन्न 
अंधेरा......... गरीबी 
जिंदगी ठुकराना.  .....आत्महत्या 
आँखों की बेटी...... आँसू 
............................

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

अरविंद केजरीवाल की जंग
अरविंद केजरीवाल की सरकार और एल जी के बीच चल रही तनातनी को लेकर दिल्ली की उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय दे दिया है. उच्च न्यायालय का निर्णय अरविंद केजरीवाल विनम्रता से स्वीकार कर लेंगे ऐसा सोचना भी गलत होगा. वैसे भी इस निर्णय को चुनौती देना उनका और उनकी सरकार का संवैधानिक अधिकार है, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही शायद उन्हें संतुष्ट कर पाए.
एक बात उन्हें और हर नागरिक को समझनी होगी कि प्रजातंत्र एक ऐसी व्यवस्था होती है जहां सरकारें संविधान के अंतर्गत चलती हैं. ऐसे निज़ाम में व्यक्ति विशेष उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितनी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं होती हैं. संविधान और उसके अंतर्गत बने सब नियम, कानून, कार्यविधि वगैरह ही एक प्रजातंत्र को प्रजातंत्र बनाये रखते हैं. अन्यथा कोई भी प्रजातंत्र किसी भी समय  तानाशाही में परिवर्तित हो सकता है.
सभी परिपक्व प्रजातंत्रों में तो अलिखित परम्पराओं (constitutional conventions) का भी लोग उतना ही सम्मान करते हैं जितना सम्मान वह लिखित संविधान और कायदे-कानून का करते हैं.  उदाहरण के लिए स्विट्ज़रलैंड की बात करें, वहां फेडरल सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति एक चुनाव द्वारा होती है, उम्मीदवार के पास किसी प्रकार का कानूनी प्रशिक्षण होने का कोई लिखित विधान नहीं है, लेकिन परम्परा के अनुसार वहां विधिशास्त्र में पारंगत और जाने-माने विधिवेत्ता ही सुप्रीम कोर्ट के जज चुने जाते हैं. इस परम्परा को तोड़ने की बात उस देश में कोई सोच भी नहीं सकता.
हर प्रजातन्त्र में ऐसा यह सम्भव है कि किसी नागरिक की या किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की किसी नियम कानून को लेकर अपनी अलग धारणा हो. समय के साथ नए नियम-कानून की भी आवश्यकता उठ खड़ी होती है. परन्तु पुराने नियम बदलने की और नए कानून बनाने की अपनी एक संवैधानिक प्रक्रिया होती है जो न चाहते हुए भी हर एक को अपनानी पड़ती है.
पर जब तक कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा बदल नहीं दिया जाता या चुनौती देने पर किसी न्यायालय द्वारा रद्द नहीं कर दिया जाता तब तक उसका पालन करना हर एक का कर्तव्य है. चुनी हुई सरकारें संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का जितना सम्मान करेंगी उतना ही प्रजातंत्र मज़बूत होगा और आम लोगों का भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विश्वास पैदा होगा.
आश्चर्य की बात यह है कि अरविंद केजरीवाल एक सिविल अधिकारी रह चुके हैं, और एक सिविल अधिकारी के लिए यह सब  समझना बहुत ही सरल होना चाहिए. एक बात और उन्हें समझनी होगी; अगर मुख्यमंत्री के पद पर बैठ कर वह किसी नियम-कानून का पालन अपनी समझ और व्याख्या की अनुसार करना चाहतें तो क्या ऐसा अधिकार वह हर एक को देने को तैयार हैं? 

हमारा प्रजातंत्र अभी बहुत पुराना नहीं है इसलिए अभी लोगों की आस्था इसमें कच्ची है. अच्छी संवैधानिक परम्परायें स्थापित करने में हमारे नेताओं की कोई अधिक रूचि नहीं रही है. देश के कितने ही ज़िलों में लोग अपना भाग्य बदलने के लिए वोट के बजाय बंदूक का सहारा ले रहे हैं. ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि हमारे नेता लोगों के सामने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करें जिसका अनुकरण करने की प्रेरणा आम आदमी को भी मिले.   

बुधवार, 3 अगस्त 2016

ये जिंदगी




ये जिंदगी कल की तरह नहीं लगती।
अब तू गज़ल की तरह नहीं लगती।।

जबसे लूटा है दरिंदों ने अस्मत उसकी।
खिलते हुए कवल की तरह नहीं लगती।।

सौतेली मॉ की ऑचल में लिपटकर पाया।
मेरे मॉ के ऑचल की तरह नहीं लगती।।

जबसे घर छोड़कर ससुराल को गई बहना।
ऑगन भी ऑगन की तरह नहीं लगती।।

मेरे खेतों की मिट्टी बड़ी सोंधी सी थी।
शहर की बू अंचल की तरह नहीं लगती।।

बहुत बोया गमलों में फूल शहर में रहकर।
ये मंजर गॉव के फसल की तरह नहीं लगती।।

ना जाने सनम की याद में बात क्या है यारों।
उसकी दस्तक ख़लल की तरह नहीं लगती।।



साथ तुम्हारा

    साथ तुम्हारा

कल तक जो किनारे थे,

अब सहारे बन गए है |

विरान थी दुनिया मेरी,

अब खुशियों के नजारे  बन गए हैं


जमाने में  तुम्हारा साथ क्या मिला,

पराए भी हमारे बन गए है |

वक्त की धुप में ,सूखने लगी है,

   अब गम की चादर ,

दुख भी अब सहारे बन गए हैं |

विरह मे छलके थे कभी जो आँसू ,

 अब मिलन मोती बन गए हैं |

जमाने में तुम्हारा साथ क्या मिला,

 पराए भी हमारे बन गए हैं |

                जी. एस. परमार
                      नीमच
               9179236750

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

Laxmirangam: IRCTC से बात न बने तो...

Laxmirangam: IRCTC से बात न बने तो...: IRCTC से बात न बने तो... आज से करीब पंद्रह दिन पहले मैंने बहुत कोशिश की कि मेरी दो टिकटें (सिकंदराबाद से भुवनेश्वर और वापसी) रद्द कर दू...