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बुधवार, 11 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 19 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत " क़िस्त 19 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

----- पिछली  क़िस्तों में ,अब तक हम ’मुफ़र्द ज़िहाफ़’ का ज़िक़्र कर चुके है यानी वो एकल ज़िहाफ़ जो सालिम रुक्न पर अकेले और एक बार ही लगता है। मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ -दो या दो से अधिक ज़िहाफ़ - से मिल कर बनता है । कभी कभी इन मिश्रित [मुरक़्क़ब] ज़िहाफ़ का एक संयुक्त नाम भी होता है और कभी कभी नहीं भी होता है । कुछ ऐसे मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ के नाम लिख रहे है जिनके नाम होते है जैसे
1-ख़ब्ल =ख़ब्न +तय्य = मुज़ाहिफ़ नाम होगा- ’मख़्बूल’
2-शकल =ख़ब्न+कफ़्फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मश्कूल
3-ख़रब =ख़रम+कफ़्फ़ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-अख़रब
4-सरम =सलम+क़ब्ज़ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-असरम
5-सतर =ख़रम+क़ब्ज़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-असतर
6-ख़ज़ल =इज़्मार+तय्य =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मख्ज़ूल
7-क़सम =असब+अज़ब  =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-अक़्सम्
8-जमम =अज़ब+अक़ल =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-अजम्
9-नक़्स =असब+कफ़्फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मन्क़ूस्
10-अक़्स =अज़ब+नक़्स =मुज़ाहिफ़ नाम होगा- अक़स्
11-क़तफ़ =असब+हज़फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मक़्तूफ़्
12-ख़ल’अ =ख़ब्न+क़त’अ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मख़्लू’अ
13-नहर =जद्द’अ+कसफ़=मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मन्हूर्
14-सलख़ =जब्ब+वक़्फ़ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मस्लूख़्
15-दरस =क़स्र+बतर = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मद्रूस्
16-हज़फ़ =बतर+हज़्फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-महज़ूफ़्
17-रब’अ =ख़ब्न +बतर = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मरबू’अ
 इसके अलावा ,कुछ मुरक़्क़ब  ज़िहाफ़ ऐसे भी हैं जिनका कोई संयुक्त नाम तो नहीं है पर अमल एक साथ करते हैं ।ऐसे ज़िहाफ़ात की चर्चा हम आगे करेंगे


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1-इसके अलावा भी कभी कभी सालिम रुक्न पर 2-ज़िहाफ़ अलग-अलग लगते है उनका कोई एकल नाम तो नही है परन्तु बहर के नाम में उसे शामिल कर लेते हैं
जिसकी चर्चा बाद में करेंगे
2- ऊपर के लिस्ट में बाईं तरफ़ जो दो अलग अलग ज़िहाफ़ के नाम लिखे हैं उस के बारे में और उनके अमल के तरीक़ों के बारे में पहले ही सविस्तार चर्चा कर चुका हूँ । अब इनका रुक्न पर  "एक साथ" कैसे  अमल करेंगे देखेंगे
3- एक बात साफ़ कर दूं मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ रुक्न पर एक साथ अमल करते हैं ।यह नहीं  कि सालिम रुक्न के किसी टुकड़े पर एक ज़िहाफ़ का अमल करा दिया और मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद हो गई फिर मुज़ाहिफ़ रुक्न पर दूसरे ज़िहाफ़ का अमल कराया। यह उसूलन ग़लत होगा ।मुज़ाहिफ़ पर ज़िहाफ़ नहीं लगाते [ सिवा ’तस्कीन’ और तख़्नीक़’ के जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
 4- जब हम मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर रहे थे तो देखा था कि मुफ़र्द ज़िहाफ़ सालिम रुक्न के किसी ख़ास टुकड़े पर [यानी सबब या वतद पर] ही लगता था और उन्हें श्रेणियों में exclusively  बाँट रखा था जैसे सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ , वतद-ए-मज्मुआ पर लगने वाले ज़िहाफ़ या सबब-ए-सकील पर लगने वाले ज़िहाफ़ वग़ैरह वग़ैरह ,परन्तु ऐसी श्रेणी विभक्ति ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़’ के case में नहीं किया जा सकता है ।कारण कि मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो या दो से ज़्यादे मुख़्त्लिफ़ [विभिन्न] मुफ़र्द ज़िहाफ़ के combination से बने है जिनके असरात सालिम रुक्न के अलग अलग टुकड़ो [वतद या सबब] पर एक साथ होंगे अत: मुरक़्क़्ब ज़िहाफ़ as a singleton  किसी ख़ास टुकड़े से मख़्सूस नही किया जा सकता
5- आप् इतने मुफ़र्द् या मुरक़्क़ब् ज़िहाफ़ात् देख् कर् आप् घबड़ाईए नहीं ।अगर आप शायरी करते हैं तो इतने अर्कान और इतने ज़िहाफ़ात में उमीदन आप शायरी नहीं करते होंगे ।आप चन्द मक़्बूल अर्कान और चन्द मक़्बूल ज़िहाफ़त में ही करते होंगे।अत: आप को न तो सारे अर्कान [19] और न ही सारे ज़िहाफ़ात की ज़रूरत पड़ेगी। मुख़्तलिफ़ शायर के मुख़्तलिफ़ अर्कान पसन्ददीदा होते हैं और उन्हीं से मयार की शायरी करते है : अत: ज़िहाफ़ात ..ये क्या होते हैं ..ये कैसे बनते हैं .ये कैसे अमल करते हैं -- के बारे में जानने में क्या हर्ज है।
एक बात और
शे’र-ओ-सुख़न के दो पहलू हैं --एक तो यही ’अरूज़’ का पहलू  और दूसरा ;तग़्ग़ज़्ज़ुल का पहलू --एक दूसरे के पूरक हैं
अरूज़ के बारे में जानना तो मात्र  शायरी का ’आधा’ भाग ही जानना हुआ --औज़ान का...बहर का ...ज़िहाफ़ का ..तक़्ती’अ का जानना हुआ
शायरी की content ,भाव..कथन..असरात ,,तो मश्क़ से ही आती है यह तो फ़न है हुनर है...ख़ुदा  की ने’मत है
अगर दोनो पहलू एक साथ रहें तो फिर मयार की शायरी होगी ....अमर होगी ...सोने पे सुहागा होगा...सोने में सुगन्ध होगा।
  अब हम एक एक कर इन ज़िहाफ़ के अमल देखते हैं

ज़िहाफ़ ख़ब्ल :-यह ज़िहाफ़ दो ज़िहाफ़ के संयोग से बना है  खब्न + तय्य  और् मुज़ाहिफ़ को ’मख़्बूल्’ कहते है ।और यह् एक् आम् ज़िहाफ़ है ।हम ख़ब्न और तय्य के तरीक़ा-ए-अमल की चर्चा पिछली किस्त में कर चुके है। हम जानते हैं कि मुफ़र्द ज़िहाफ़ ख़ब्न और  मुफ़र्द ज़िहाफ़ तय्य .सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगते है जिसमे ज़िहाफ़् ख़ब्न् तो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् के दूसरे मुक़ाम् पर् और् ज़िहाफ़ तय्य सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के चौथे मुकाम पर असर डालता है  तो यह मिश्रित ज़िहाफ़ ’ख़ब्ल ’ भी  बज़ाहिर ऐसे रुक्न पर लगेगा जो  -सबब[2]+सबब[2]+वतद [3] से बनता ऐसे 2-ही सालिम रुक्न है  मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12] और् मफ़् ऊ लातु [2 2 21]

अब हम इस ज़िहाफ़ का अमल देखते हैं
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12] + ख़ब्ल्   = मु त इलुन् [ 1 1 12] यानी  खब्न् से दूसरे स्थान् पर  मुस् का साकिन् -स्- गिरा दिया और् तय्य् से   चौथे स्थान् का साकिन्-फ़्- गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’मु त इलुन् [1 1 12]  जिसे मानूस् रुक्न् ’फ़ इ लतुन् [1 1 12] से बदल् लिया
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 2 1 ]+ख़ब्ल्  = म अ लातु [1 1 21 ] यानी ख़ब्न् से दूसरे स्थान् मफ़् का  साकिन् -फ़्- और् तय्य् से चौथे स्थान् पर्  "ऊ’ का ’वाव्’ गिरा दिया तो बाक़ी बचा म ’अ [एन् ब हरकत्] लातु [ 1 1 2 1] जिसे मानूस् बहर् -फ़ इ लातु- से बदल् लिया
 जब् बहर रजज़ और बहर मुक़्तज़िब की चर्चा करेंगे तो वहाँ भी इन ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे कि कैसे ये ज़िहाफ़ बहर की रंगारंगी में योगदान करते हैं

 ज़िहाफ़् शकल् : यह् ज़िहाफ़् दो ज़िहाफ़् के संयोग् से बना है ख़ब्न् और् कफ़् से। और् मुज़ाहिफ़् को -मश्कूल् -कहते हैं ।और यह एक आम ज़िहाफ़ है ।हम ख़ब्न और कफ़् के तरीक़ा-ए-अमल की चर्चा पिछली किस्त में कर चुके है।ज़िहाफ़ खब्न् , सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् के दूसरे मुक़ाम पर अमल करता है जब कि ज़िहाफ़ कफ़ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के ’सातवें ’ मक़ाम पर अमल करता है }बज़ाहिर यह उन्ही रुक्न में संभव है जो -सबब[2] +वतद[3]+सबब[2] से बनता है और ऐसे रुक्न 2 है जैसे ’फ़ा इला तुन्’ और मुस् तफ़्’अ इलुन् [ मुस तफ़् इलुन् की मुन्फ़सिल् शकल्] जिसमे ज़िहाफ़् खब्न् और् कफ़् लग् सकता है
 फ़ा इला तुन् [2 12 2] + शकल्  = फ़ इला तु [1 12 1] यानी  ज़िहाफ़् ख़ब्न् के अमल् से फ़ा [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का अलिफ़्] और् ज़िहाफ़् कफ़् की अमल् से सातवें मुक़ाम पर् सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का -न्- को गिरा दिया ,बाक़ी बचा -फ़् इला तु [ 1 12 1]
मुस् तफ़्’अ लुन् [ 2 21 2] +शकल् = मु तफ़्’अ लु [ 1 21 1] यानी ज़िहाफ़् ख़ब्न् से मुस् का -स्-[जो दूसरे मुक़ाम् पर् है  और् ज़िहाफ़् कफ़् लुन् का -न्- [जो सातवें मुक़ाम् पर् है] गिरा दिया तो बाक़ी बचा  मु तफ़्’अ लु [ 121 1] जिसे मफ़ाइलु [12 11] [एन् -ब हरकत्] दे बदल लिया

ज़िहाफ़ ख़रब : यह ज़िहाफ़ दो ज़िहाफ़ -ख़रम+कफ़्फ़ के संयोग से बना है -और मुज़ाहिफ़ को ’अख़रब’ कहते है हम जानते हैं कि ’ख़रम’  वतद [ वतद-ए-मज्मुआ ] पर लगता है और इस का काम है वतद के सर को क़लम करना यानी गिराना और ’कफ़’ का काम है सातवें मक़ाम पर जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का साकिन है गिराना । और यह तभी मुमकिन है जब रुक्न -वतद [3] +सबब[2]- सबब[2] से बना हो । और 8-सालिम रुक्न में से मात्र 1-रुक्न ही ऐसा है जिसमे यह निज़ाम पाया जाता है
और वह  है----मुफ़ा ई लुन [12 2 2] =वतद+सबब+सबब
मुफ़ा ई लुन [12 2 2 + खरब   =  फ़ा ई लु [2 2 1] यानी मुफ़ा जो वतद-ए-मज्मुआ है का सर ’मु’ [मीम] का ख़रम कर दिया  तो बचा ’फ़ा’ और सातवें  मुक़ाम पर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का  नून साकिन है गिरा दिया तो बाक़ी बचा ई लु [यानी लाम  मय हरकत]
तो हासिल हुआ ’फ़ा ई लु [2 2 1] इसे रुक्न मफ़ऊलु [2 2 1] से  बदल लिया यह् ज़िहाफ़् शे’र् के सदर् और् इब्तिदा के मुक़ाम् पर लगते हैं

ज़िहाफ़ सरम : यह भी एक मुरक़्क़ब [मिश्रित] ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ [एकल] सलम+ क़ब्ज़ से मिल कर बना है ।मुज़ाहिफ़ को ’असरम’कहते हैं। [ वतद मज्मुआ] के सर-ए-वतद को गिराना यानी ख़रम करना ही ’फ़ऊलुन; के केस में सलम कहलाता है और सबब-ए-खफ़ीफ़ के पाँचवें मुक़ाम से हर्फ़-ए-साकिन को गिराना क़ब्ज़ कहलाता । यह स्थिति तभी बन सकती है जब रुक्न में -वतद-ए-मज्मुआ[3]+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2] से बना है  और 8-सालिम रुक्न में से 1-ही रुक्न ऐसा है जिसमें यह निज़ाम है और वह है ’फ़ऊलुन’
फ़ऊलुन् [12 2 ]+ सरम् = ऊ लु [21] यानी ख़रम् के अमल् से -मफ़ा [12] वतद् मज्नुआ का ’फ़े’ और् क़ब्ज़् के अमल् से पाँचवें मुक़ाम् पर् का साकिन् -नून्-[न्] गिरा दिया तो बाक़ी बचा -ऊलु [लाम् मय् हरकत्] जिसे रुक्न् -फ़’अ लु [लाम् मय् हरकत्] से बदल् लिया । यह् ज़िहाफ़् शे’र् के सदर् और् इब्तिदा के मुक़ाम् पर लगते हैं

इस सिलसिले के  बाक़ी ज़िहाफ़ात की चर्चा  अगली क़िस्त में करेंगे....

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछले अक़सात के आलेख आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

सोमवार, 9 जनवरी 2017

ओम पूरी ने अगर कहीं ओर जन्म लिया होता?
गोविन्द निहालनी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘आक्रोश’ देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया था. सबसे चौंकाने वाला था ओम पूरी का अभिनय; लगभग सारी फिल्म में ओम पूरी का एक भी डायलाग नहीं है पर इसके बावजूद उनका अभिनय देखने वाले को झकझोड़ देता है.
उस दिन मन में एक प्रश्न उठा, ‘क्या और अभिनेता है  जो ऐसा अभिनय करने की क्षमता रखता है?’ आज भी जब उस किरदार के विषय में सोचता हूँ तो वह प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है.
ओम पूरी ने अभिनय करने की अपनी विलक्षण प्रतिभा का भरपूर प्रदर्शन कई फिल्मों में किया. ‘अर्ध सत्य’ का अनंत वेलेंकर और ‘जाने भी दो यारो’ का आहूजा ऐसे ही दो यादगार किरदार हैं जिन्हें ओम पूरी ने बड़ी सफलता के साथ निभाया था और देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था.  
पर ओम पूरी कभी सुपर स्टार नहीं बन पाये. उन्हें लोगों ने कभी भी उतना सम्मान नहीं दिया जितना वह उन सुपर स्टारों को देतें हैं जिन में अभिनय करने की क्षमता बहुत सीमित है. अगर ओम पूरी जी ने किसी और देश में जन्म लिया होता तो वह अपनी इस प्रतिभा के कारण कब के एक सुपर स्टार बन गए होते. ओम पूरी किसी भी तरह Robert De Niro  या Al Pacino से कम योग्य नहीं थे पर ओम पूरी को अपने देश में वैसा स्थान कभी नहीं मिला जैसा उन दो कलाकारों को अपने देश में मिला है. 
यह विचार करने की बात है कि हम अकसर अतिसामान्य लोगों को सर आँखों पर बैठा लेते हैं और प्रतिभाशाली लोगों की अवहेलना कर देते हैं. आडम्बर हमें सम्मोहित कर देता है और सादगी का हम अपमान कर देते हैं. अपराधियों को हम सत्ता सौंप देते हैं और सीधे-सच्चे लोगों को पीछे धकेले देते हैं. ईमानदारी हमें कष्टकारक लगती है झूठ का रास्ता हमें सरल लगता है.
जिस समाज के लिए सत्य सिर्फ एक नारा भर हो उस समाज में प्रतिभा को रास्ते में खड़े हो कर बिकना ही होगा, सम्मानित तो बस वह होगा जिस के पास प्रतिभा का मोल लगाने का सामर्थ्य होगा.


शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

एक ग़ज़ल : गो धूप तो हुई है ....

एक ग़ज़ल : गो धूप तो हुई है.....

गो धूप तो हुई है , पर ताब वो नहीं है
जो ख़्वाब हमने देखा ,यह ख़ाब वो नही है
मज़लूम है कि माना ख़ामोश रहता अकसर
पर बे नवा नही है ,बे आब वो नही है
कुछ मग़रिबी हवाओं का पुर असर है शायद
फ़सले नई नई हैं ,आदाब वो नहीं है
अपने लहू से सींचा है जाँनिसारी कर के
आई बहार लेकिन शादाब वो नही है
एह्सास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत ,अस्बाक़-ए-तर्क-ए-उल्फ़त
मेरी किताब-ए-हस्ती में बाब वो नहीं है
इक नूर जाने किसका दिल में उतर गया है
एहसास तो है लेकिन क्यूँ याब वो नही है
ता-उम्र मुन्तज़िर हूँ दीदार-ए-यार का मैं
बेताब जितना ’आनन’ ,बेताब वो नही है


शब्दार्थ
ताब =गरमी/चमक/उष्णता
मजलूम = जिस पर जुल्म हुआ हो/पीड़ित/शोषित
बे-नवा = बिना आवाज़ का /गूँगा
बेआब = बिना इज्जत का
मगरिबी हवाएँ = पश्चिमी सभ्यता
जानिसारी =प्राणोत्सर्ग
आदाब =तमीज-ओ-तहज़ीब
शादाब = खुशहाली
एहसास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत ,अस्बाक़-ए-तर्क-ए-उलफ़त
= लालच और नफ़रत की अनुभूति और प्यार मुहब्बत के छोड़ने
भुलाने के सबक़/पाठ
मेरी किताब-ए-हस्ती = मेरे जीवन की किताब में
याब = प्राप्य/मिलता
मुन्तज़िर = इन्तज़ार में /प्रतीक्षा में
-आनन्द.पाठक-
08800927181

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :- क़िस्त 18 [ज़िहाफ़ात]

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उर्दू बह्र पर एक बातचीत :- क़िस्त 18 [ज़िहाफ़ात]
[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]

कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो वतद-ए-मफ़रुक़ पर लगते हैं

वतद-ए-मफ़रुक़ की परिभाषा पहले भी लिख चुका हूँ ।एक बार फिर लिख रहा हूं
वतद-ए-मफ़रुक़ :- वो 3-हर्फ़ी कलमा जिस में पहला हर्फ़ हरकत ,दूसरा हर्फ़ साकिन और तीसरा हर्फ़ हरकत हो यानी     ’ हरकत+साकिन+ हरकत”
चूंकि दो हरकत के बीच में कुछ ’फ़र्क ’है [यानी एक साथ ,एक के बाद एक , जमा नही है] कारण कि  बीच में साकिन हर्फ़ आ आ गया इसी लिए इसे .मफ़रुक़’ कहते हैं
मगर एक बात
उर्दू जुबान में कोई लफ़्ज़ ऐसा नहीं होता आख़िरी हर्फ़  मुतहर्रिक होता हो  [यानी आखिरी लफ़्ज़ पर हरकत हो] दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उर्दू जुबान का हर लफ़्ज़ ’साकिन’ पर गिरता है तो फिर .मफ़रुक़ ’ लफ़्ज़ कौन से  होंगे?
यही बात ’सबब-ए-सकील ’[हरकत+ हरकत ] में भी उठी थी
पर हां ,दो तरक़ीब ऐसी है जिससे साकिन हर्फ़ पर एक हल्का सा ’हरकत [जबर,जेर,पेश जिसे संयुक्त रूप से ’एराब’ भी कहते है ] आ जाता है और वो तरक़ीब है --इज़ाफ़त और अत्फ़ की
गो इज़ाफ़त और अत्फ़ फ़ारसी की तरक़ीब है मगर उर्दू निज़ाम में भी  इसे अपना ली गई है [हालाँ  कि इसके लिए अरबी में ’अल आ उल’ का प्रयोग करते हैं
ख़ैर --एक शे’र की परोडी पढ़ रहा हूँ ।------
 खुदा जब ’अत्फ़’ करता है तो ’हरकत’ आ ही जाती है ......मूल शे’र तो आप ने सुना ही होगा.
जैसे फ़स्ल-ए-गुल ......, दर्द-ए-दिल......गुफ़्त-ओ-सुनीद ...शह्र-ए-वीरां  ....
अगर ख़ाली  लफ़्ज़    ...फ़स्ल .....दर्द....गुफ़्त.. मुफ़्त  .....शह्र ...रुत ...होता तो लाजिमन हर्फ़ उल आख़िर क्रमश:   ल्  .....द्......त्.....र्.....सब् ’साकिन’ होता  मगर जब इज़ाफ़त या अत्फ़ के साथ बोलते है तो इन हर्फ़ पर एक ठहराव या हल्का सा  वज़न आ जाता है या महसूस होता है  ...बस इन हरूफ़ [ ब0ब0 हर्फ़]  को मय हरकत समझेंगे

अरूज में  ’वतद-ए-मफ़रुक़’ को ’लातु ’...फ़ा’अ......तफ़्’अ...[ ’अ  -ऐन  मय हरकत है यहाँ ] आदि से दिखाते हैं 

  लातु [मफ़ऊलातु में ] ----जिस में लाम+अलिफ़+ तु = हरकत+साकिन+ हरकत है
’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............जिस् में [ फ़े+अलिफ़+एन मय हरकत= हरकत+साकिन्+हरकत्
 तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....जिस् में    [ ते+फ़े+एन् मय् हरकत् ]   = हरकत् +साकिन्+ हरकत्

अगर आप इजाजत दें तो एक दिलचस्प बात यहाँ और यहीं discuss कर लें---कारण बाद में बताऊँगा

फ़ा’अलातुन या फ़ाइलातुन --बहर-ए-रमल का बुनियादी रुक्न है और जिसका वज़न दोनो case  में 2 1 2 2 ही है मगर लिखने का तरीक़ा [उर्दू स्क्रिप्ट में ] दो क़िस्म  के है
एक तरीक़ा यह कि -सब हर्फ़ मिला कर लिखते है -जैसे ’फ़ाइलातुन ’ में तो इसे ’मुतस्सिल ’ शकल कहते है जो  ’सबब-ए-ख़फ़ी्फ़ (फ़ा) +वतद-ए-मज्मुआ [इला]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] से मिल कर बना है
और दूसरा तरीक़ा यह कि  कुछ हर्फ़ ’फ़ासिला ’देकर लिखते है  जैसे  फ़ा’अ ला तुन में तो इसे ’मुन्फ़सिल ’ शकल कहते हैं जो वतद-ए-मफ़रुक़ [फ़ा’अ] +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ ला ] +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] से मिल कर बना है
और ख़ूबी यह कि दोनो ही शकल का वज़न 2  1 2 2  ही है -कोई फ़र्क़ नहीं।  मगर ज़िहाफ़ लगाने में ’फ़र्क़’ होगा । पहले case  में वतद-ए-मज्मुआ के ज़िहाफ़ात लगेंगे और दूसरे case  में वतद-ए-मफ़रुक़ के ज़िहाफ़ लगेगे
इस पर विस्तार से चर्चा तब करेंगे जब उर्दू के 19  बहर की individual चर्चा करेंगे [जो आगे आयेगा]

यही बात मुस् तफ़् इलुन् और् मुस् तफ़्’अ लुन् की भी है। यह् रुक्न् बहर-ए-रजज़ की बुनियादी रुक्न है और पहली शकल -मुस् तफ़् इलुन् को -मुतस्सिल् शक्ल् कहते है जब कि -मुस् तफ़्’अ लुन्- को मुन्फ़सिल् -शकल कहते हैं
मुस् तफ़् इलुन्  = सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + सबब-ए-ख़फ़ीफ़् + वतद-ए-मज्मुआ  से मिल् कर् बना है  और इस पर वतद-ए-मज्मुआ के ज़िहाफ़ लगेंगे
मुस् तफ़्’अ लुन् = सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + वतद-ए-मफ़रुक़ + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से मिल कर बना है  और इस पर वतद-ए-मफ़रूक़ के ज़िहाफ़ लगेंगे

इसमे भी ख़ूबी वही कि दोनो ही केस में रुक्न का वज़न 2 2 1 2 ही होगा
  एक बात और --जब हर्फ़ अलिफ़ लफ़्ज़ के शुरु में आयेगा तो वो हरकत में होगा -कारण कि उर्दू जुबान का कोई लफ़्ज़ साकिन से शुरु ही नहीं होता है [हिन्दी में भी नहीं होता है] मगर अलिफ़ [हम्ज़ा] [दोनो की आवाज़  /उच्चारण/तलफ़्फ़ुज़] एक जैसा है अगर लफ़्ज़ के बीच में या आख़िर में आये तो यह साकिन होगा । इसीलिए ’लातु’ [ लाम +अलिफ़ +साकिन } का अलिफ़ साकिन है
अब हम उन ज़िहाफ़ पर आते हैं जो वतद-ए-मफ़रुक़’ पर लगता है
चूँकि वतद-ए-मफ़रुक़ लफ़्ज़  कम ही मिलते है , लाजिमन ज़िहाफ़ भी कम ही होते हैं  और वो ज़िहाफ़ हैं
वक़्फ़........कस्फ़ [कश्फ़].......सलम 
आइए  इन ज़िहाफ़ात का अमल कैसे होगा ,देखते हैं

ज़िहाफ़ वक़्फ़ : किसी सालिम रुक्न में आने वाले वतद-ए-मफ़रुक़ के दूसरे वाले मुतहर्रिक को साकिन करना ’वक़्फ़’ कहलाता है । और मुज़ाहिफ़ को ’मौक़ूफ़ ’ कहते हैं ।यह ज़िहाफ़ अरूज़ और जर्ब से मख़सूस है
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से  3-रुक्न ऐसे हैं जिन में वतद-ए-मफ़रुक़ [हरकत+साकिन+हरकत[ आता है  जिनकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं और वो हैं
लातु [मफ़ऊलातु में ] ---- ’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............  तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....

 मफ़ऊलातु ( 2 2 2 1) +वक़्फ़  =  मफ़ ऊ ला त (2 2 2 1) यानी लातु का -तु- जो मुतहर्रिक है-को साकिन कर दिया तो बचा -त्- यानी मफ़ऊलात् [2 2 2 1] जिसे मानूस् रुक्न् -मफ़ऊलान् ( 2 2 2 1) बदल लिया
यह ज़िहाफ़ साधारणतया रुक्न  ’ मफ़ऊलातु’ तक ही सीमित है  इसका अमल ’ फ़ा’अ...या  तफ़्’अ पर नहीं कराया जा सकता -कारण् कि ये टुकड़े सालिम् रुक्न् के बीच् में आ रहे है  और् -’अ [ जो यहाँ मुतहर्रिक् है अभी ]इस् वक़्फ़् के अमल् से  -साकिन् हो जायेगा तो फिर सालिम रुक्न के बीच में दो-दो साकिन मुसलसल [लगातार] आ जायेगा जो लिहाज-ए-रुक्न  ज़ायज नहीं।

ज़िहाफ़ कस्फ़ :- इसे ’कश्फ़’ भी लिखते हैं। वतद-ए-मफ़रुक़ के दूसरे मुतहर्रिक को गिराना ’कस्फ़’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को मक्सूफ़ /मक्शूफ़ कहते हैं यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
बज़ाहिर इसका अमल  भी उन्ही ऊपरवाले 3-अर्कान पर होगा जिसमें वतद-ए-मफ़रुक़ आता है

[मफ़ऊलातु (2 2 2 1) +कस्फ़   = मफ़ऊ ला [ 2 2 2 ] यानी लातु का दूसरा मुतहर्रिक -तु- गिरा दिया तो बाक़ी बचा यानी मफ़ऊला [2 2 2] जिसे मानूस रुक्न ’मफ़ऊ लुन [2 2 2] से बदल लिया
साधरणतया यह ज़िहाफ़ भी -मफ़ऊलातु -तक ही सीमित है
पर |technically  इसे ’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............  तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....पर भी अमल कराया  जा सकता है। देखते हैं कैसे?
 फ़ा’अ ला तुन् [ 2 1 2 2]  + कस्फ़  = फ़ा ला तुन [2 2 2] यानी फ़ा’अ का -’अ [जो मुतहर्रिक है ] को गिरा दिया तो बाक़ी बचा फ़ा ला तुन [2 2 2] जिसे मानूस रुक्न  ’मफ़ ऊ लुन [2 2 2 ] से बदल लिया
 मुस् तफ़्’अ लुन् [2 21 2]+कस्फ़    = मुस् तफ़् लुन् [2 2 2] यानी तफ़्’अ का -’अ [जो मुतहर्रिक् है] को गिरा दिया तो बाक़ी बचा मुस् तफ़् लुन् [2 2 2] जिसे मानूस रुक्न् ’मफ़् ऊ लुन् [2 2 2 ] से बदल् लिया

खूबी यह कि  तीनो केस में  मुज़ाहिफ़ रुक्न -मफ़ऊलुन-[2 2 2] ही रहता है

ज़िहाफ़ सलम :- अगर किसी रुक्न में वतद-ए-मफ़रुक़ आता है तो पूरा का पूरा  ’वतद’  ही गिरा देना  ’सलम’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को ;असलम’ कहते है और यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मखसूस है
बज़ाहिर इसका अमल  भी उन्ही ऊपरवाले 3-अर्कान पर होगा जिसमें वतद-ए-मफ़रुक़ आता है
साधरणतया यह ज़िहाफ़ भी -मफ़ऊलातु -तक ही सीमित है
|technically  इसे ’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............  तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....पर भी लगाया जा सकता है।
’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में [ 2 1 2 2 ] +सलम =  ला तुन्  यानी फ़ा’अ ला तुन से -फ़ा’अ- गिरा दिया तो बाक़ी बचा ला तुन [2 2] इसे हम वज़्न रुक्न ’फ़े’  लुन [2 2] से बदल लिया
तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .[2 2 1 2] +सलम =मुस् लुन् [2 2 ] यानी मुस् तफ़्’अलुन् से -तफ़्’अ गिरा दिया तो बाक़ी बचा मुस् लुन् [22] जिसे मानूस् हमवज़्न् रुक्न् ’फ़े’लुन् [22] से बदल् लिया

यानी इस केस में तीनो मुज़ाहिफ़ हम वज़्न है [22]

 अब तक हम ने उन एकल ज़िहाफ़ [फ़र्द ज़िहाफ़] की बात की जो सालिम अर्कान के खण्ड [ सबब और वतद ] पर लगते हैं । हालाँकि ज़िहाफ़ के इस चर्चा में बहुत से ’किन्तु-परन्तु’ थे पर हम ने उस पर विस्तार से चर्चा नहीं किया इसलिए कि उसकी यहां  ज़रूरत नहीं थी। इस चर्चा का आशय मात्र इतना ही है कि हमारे हिन्दी दाँ दोस्त , उर्दू शायरी के बह्र ,अरूज़,अर्कान ज़िहाफ़ आदि के बारे में मोटा मोटी जानकारी प्राप्त कर सके। यह चर्चा ’अरूज़’ की बहुत बारीकियों और बहुत गहराईयों में जाने की नही है।एकल ज़िहाफ़ से मेरा आशय उन ज़िहाफ़ात से है जो  रुक्न के किसी एक टुकड़े पर एक समय में एक बार ही अमल करते है और रुक्न की शकल बदल देते हैं जिसे हम मुज़ाहिफ़ रुक्न कहते है
अब तक हम उन ज़िहाफ़ात की चर्चा कर चुके हैं जो निम्न टुकड़ों पर लगते हैं

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर  :-ख़ब्न.....तय्यी....कब्ज़्....कफ़्फ़्...क़स्र्...ह्ज़्फ़्....रफ़’अ.........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़
सबब-ए-सकील पर  :-इज़्मार.....अस्ब.....वक़्स.....अक् ल्  
वतद-ए-मज्मुआ पर:-खरम्.....सलम्......अजब्......कत्’अ........हज़ज़्.....अरज्......तमस्.........बतर्......इज़ाला....तरफ़ील्  
वतद-ए-मफ़रुक़ पर:- वक़्फ़........कस्फ़ [कश्फ़].......सलम 

अच्छा ,एक बात तो रह गई ...
हमने 2-हर्फ़ी कलमा [सबब] ....3-हर्फ़ी कलमा [वतद] की तो बात कर ली और इसी पर सारे ज़िहाफ़ का ज़िक़्र भी कर लिया मगर अरूज़ की किताबों मे 4-हर्फ़ी कलमा का भी ज़िक़्र है -उसकी चर्चा नहीं की। ज़रूरत ही नहीं पड़ी अभी तक।
मगर जानकारी के लिए एक संक्षिप्त चर्चा कर लेते है अभी
चार हर्फ़ी कलमा को ’फ़ासिला’ कहते है-जैसे अकसर....करतब.....मकतब....हरकत...वग़ैरह वग़ैरह। इस फ़ासिला के भी दो क़िस्म होती है और वो हैं----फ़ासिला सग़रा  और फ़ासिला कबरा
फ़ासिला सग़रा :- वो चार हर्फ़ी कलमा जिसमें  तीन हर्फ़ तो मुतहर्रिक हो और आख़िरी हर्फ़ साकिन हो  यानी  [ हरकत+हरकत ] +[ हरकत+साकिन ] यानी दूसरे शब्द में हम इसे सबब [2-हर्फ़ी] से भी तो दिखा सकते हैं
= सबब-ए-सकील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़

फ़ासिला कबरा = वो 5-हर्फ़ी कलमा जिसमें 4-हर्फ़ तो मुतहर्रिक हो और आखिरी हर्फ़ साकिन हो यानी [ हरकत+हरकत ] +[ हरकत+हरकत+साकिन ] उर्दू में ऐसे लफ़्ज़ बहुत कम है। शायद न के बराबर
=सबब-ए-सकील +वतद-ए-मज्मुआ
जब ’फ़ासिला’ को सबब और वतद के combination से दिखा सकते और उसी पर सारे ज़िहाफ़ात की चर्चा  भी कर सकते है  तो फ़ासिला के बारे में और गहराईयों में जाने की ज़रूरत नही समझता। हां अगर अरूज़ की किताबों में इस का ज़िक़्र  है तो ग़ैर ज़रूरी तो यक़ीनन नहीं होगा।
-

अब अगली क़िस्त में ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़’ [मिश्रित ज़िहाफ़ ] की चर्चा करेंगे 

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछले अक़्सात [ब0ब0 क़िस्त] के आलेख आप मेरे ब्लाग पर देख सकते हैं 

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मंगलवार, 3 जनवरी 2017

उर्दू बहे पर एक बातचीत : क़िस्त 17 [ज़िहाफ़ात]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 17 [ज़िहाफ़ात]

[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]


{  अभी चर्चा  उन ज़िहाफ़ात के बारे में चल रही है जो उर्दू शायरी में सालिम रुक्न के टुकड़े/खण्ड  [ज़ुज]- वतद-मज्मुआ पर लगते हैं । पिछली क़िस्त [16] में हम ऐसे 5-ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर चुके है ,बाक़ी  5 ज़िहाफ़ पर बातचीत इस क़िस्त में  करेंगे।वो बाक़ी 5-ज़िहाफ़ हैं --- अरज्......तम्स.........बतर्......इज़ाला....तरफ़ील्  

ज़िहाफ़ ’अरज :- अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में -वतद मज्मुआ -आ रहा हो तो दूसरे मुक़ाम पर जो हर्फ़ मुतहर्रिक है- को साकिन करना ;’अरज’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को भी  ’अरज’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ ’अरूज़/जर्ब ’ से मख़्सूस है

हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 3-रुक्न ऐसे हैं जिसके आख़िर में ’वतद मज्मुआ’ आता है और वो रुक्न हैं
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12].........................फ़ा इलुन् [ 2 12]........मु त फ़ा इलुन् [1 1 2 12]
मुस् तफ़् इलुन् [ 2 2 12]  +’अरज् =  मुस् तफ़् इल् न् [ 2 2 2 1] यानी ’इलुन्’[12][वतद् मज्मुआ] का दूसरा मुतहर्रिक् ’लु’ को साकिन् कर् दिया तो बचा ’ल्’[लाम् साकिन्] को इ के साथ् मिल् कर् ’इल्’ [2 सबब-ए-खफ़ीफ़् बन् गया] और् आखिरी ’न्’ तो साकिन् पहले से ही था । अब् इस् मुज़ाहिफ़् रुक्न् ’मुस् तफ़् इल् न् [2 2 2 1] को किसी मानूस् रुक्न् ’मफ़् ऊ लान् [2 2 2 1] से बदल् लिया
आलिम जनाब डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के मेराज-उल-अरूज़ के हवाले से--रवाअती अरूज़ में इस ज़िहाफ़ का अमल तो सिर्फ़ ’मुस तफ़ इलुन’ पर ही कराया जाता है पर[technically ] इसे रुक्न फ़ाइलुन और म त फ़ा इलुन पर भी कराया जा सकता है  जिस के ’आख़िर’ में ’इलुन’ [वतद-ए-मज्मुआ] आता है
देखते हैं -ज़िहाफ़ ’अरज’ का अमल इन दो रुक्न पर कैसे होता है।
फ़ा इलुन् [2 12] + अरज् = फ़ा इल् न् [ 2 2 1] यानी ’इलुन् [जो वतद्-ए-मज्मुआ है और् रुक्न  के आख़िर् में भी आ रहा है ]- के दूसरे मक़ाम् जो मुतहर्रिक्  ’लु’ है -को साकिन् कर् दिया तो ’ल्’ [लाम्’ साकिन् ] बचा जो उस् से पहले वाले -इ- से मिल् कर् इल् [2] बना लिया तो मुज़ाहिफ़् रुक्न् की शकल् हो गई ’फ़ा इल् न् [2 2 1] जिसे मफ़् ऊ ल् [2 2 1] से बदल् सकते हैं

मु त फ़ा इलुन् [1 1 2 12] + ’अरज् = मु त फ़ा इल् न् [ 1 1 2 2 1] -अमल् वैसे ही होगा जैसा ऊपर हुआ है और इस को रुक्न ’फ़े ’अ ला ता न्’[1 1 2 2 1 से बदल् लिया-ध्यान रहे यहाँ -’अ [ऎन -मुतहर्रिक है और 1- का वज़न दे रहा है ]
यह ज़िहाफ़ भी ’अरूज़ और जर्ब’ से मख़्सूस है

ज़िहाफ़  तम्स =-अगर किसी सालिम रुक्न के आखिर में वतद-ए-मज्मुआ हो और उसके पहले ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो वतद-ए-मज्मुआ के दोनो मुतहर्रिक को गिरा देना ’तम्स’ कहते हैं और मुज़ाहिफ़ को ’मत्मूस’ कहते है । यह ज़िहाफ़ भी शे’र के अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है

हम जानते है कि उर्दू के  8-सालिम रुक्न में 2 रुक्न् ऐसे है जिसके आखिर् में वतद-ए-मज्मुआ आता है उससे  पहले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो हैं...
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12] .....फ़ा इलुन्..[2 12]

मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12]+ तम्स्      = मुस् तफ़् न् [2 2 1] यानी वतद्-ए-मज्मुआ का -इ और् लु [जो कि मुतहर्रिक् है] गिरा दिया तो बाक़ी बचा मुस् तफ़् न् [2 2 1] जिसे मानूस् हम वज़्न् रुक्न् ’मफ़् ऊल्’[2 2 1] से बदल लिया
फ़ा इलुन्     [2 12 ]     + तम्स      = फ़ा  न् [2 1] यानी  वतद्-ए-मज्मुआ का -इ और् लु [जो कि मुतहर्रिक् है] गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’फ़ा न् [2 1] जिसे हम वज़्न् मानूस् रुक्न् -फ़ा’अ [2 1] से बदल् लिया ख्याल रहे यहाँ -’अ [ऐन्] साकिन् है -न्- की जगह्
ज़िहाफ़् बतर् :-अगर किसी सालिम रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और  उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तो वतद-ए-मज्मुआ को गिरा देने का अमल ’बतर’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को ’अबतर’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
हम जानते हैं कि उर्दू के 8-सालिम रुक्न में से 2- रुक्न ऐसे है जिसके आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ आता है और वो रुक्न हैं
 फ़ा इला तुन्.. [ 2 12 2 ]....फ़ऊ लुन्....[12 2] अब देखिए इन् पर ज़िहाफ़ बतर का अमल कैसे होता है

फ़ा इला तुन्  [2 12 2] + बतर     =  फ़ा तुन्  [2 2 ] यानी तुन् [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् -तुन् 2] से पहले  वतद्-ए-मज्मुआ [इला 12] है -इसको गिरा दिया [साकित् कर् दिया] तो बाक़ी बचा ’फ़ातुन्’[22] जिसे हम् वज़न् मानूस् रुक्न् ’फ़े’अ लुन् ’ [2 2] से बदल् लिया
फ़ऊ लुन् [12 2]+ बतर् =  लुन् [2] यानी लुन्[2]  [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् ] से पहले वतद्-ए-मज्मुआ ’फ़ऊ [12] है को गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’लुन्’[2] जिसे किसी हम वज़न् मानूस् रुक्न् ’फ़े’अ’ [2] [बसकून् ऐन् यानी ऎन् यहाँ साकिन् है ]से बदल् लिया

 ये तो रहे वो ज़िहाफ़ात् जो वतद्-ए-मज्मुआ पर् लगते है और जिन जिन रुक्न पे लगे उन सबमें कोई न कोई हर्फ़ का नुक़सान हुआ ..कभी कोई साकिन हो गया ,,,कभी कोई साकित हो गया ..कभी कोई मुतहर्रिक हर्फ़ ही उड़ गया मतलब ये कि  हर्फ़ का नुक़सान ही नुक़सान हुआ । यही बात सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात पर भी हुई थी [जिसकी चर्चा यथा स्थान कर भी चुका हूँ ।पर हमेशा ऐसा नहीं होता । कुछ ज़िहाफ़ ऐसे भी है जो वतद पे लगते है तो वज़न या हर्फ़ में इज़ाफ़ा भी होता है और वो ज़िहाफ़ है---इज़ाला  और तर्फ़ील ।
ज़िहाफ़् इज़ाला :- अगर् किसी रुक्न् के आख़िर् में वतद् मज्मुआ हो तो इसके साकिन् हर्फ़् से पहले एक् साकिन् हर्फ़् और् बढ़ा देते हैं । इसे ’इजाला’ कहते हैं और् मुज़ाहिफ़् को ”मज़ाल्’ कहते हैं और् यह् ज़िहाफ़् भी अरूज़् और् जर्ब् से मख़सूस् है
हम् जानते है कि 8-सालिम् रुक्न् में से 3-रुक्न् ऐसे हैं जिसके आख़िर् में ’वतद्-ए-मज्मुआ’ आता है और् वो रुक्न् हैं
फ़ाइलुन् [2 12]........मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12].......मु त फ़ा इलुन् [1 1 2 12]

इन् तीनो रुक्न् के आख़िर् में ’इलुन्’ आ रहा है यानी [ऐन्+लाम्+नून्]  जो वतद्-ए-मज्मुआ है और् नून् साकिन् है । बस् इसी नून् साकिन् के पहले एक् ’साकिन्’ हर्फ़् ’अलिफ़्’ और् बढ़ा देते [इज़ाफ़ा कर् देते हैं] है जिसे ’इज़ाला’ कहते हैं और् फिर् तीनों अर्कान् के मुज़ाहिफ़ सकल हो जायेंगे
फ़ाइलान् [2 12 1].....मुस् तफ़् इलान् [ 2 2 12 1].......मु त फ़ा इला न् [ 1 1 2 12 1]

ज़िहाफ़् तर्फ़ील् :- अगर् किसे रुक्न् के आख़िर् में वतद्-ए-मज्मुआ आता है तो उस के बाद् एक् ’सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् [2] का इज़ाफ़ा कर् देना ही तर्फ़ील् कहलाता है और् मुज़ाहिफ़् को ’मुरफ़्फ़ल्’ कहते हैं
हम् जानते है कि 8-सालिम् रुक्न् में से 3-रुक्न् ऐसे हैं जिसके आख़िर् में ’वतद्-ए-मज्मुआ’ आता है और् वो रुक्न् हैं
फ़ाइलुन् [2 12]........मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12].......मु त फ़ा इलुन् [1 1 2 12]

इन् तीनो रुक्न् के आख़िर् में ’इलुन्’ आ रहा है यानी [ऐन्+लाम्+नून्]  जो वतद्-ए-मज्मुआ है बस इसी वतद् के बाद एक् सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् [जैसे -तुन्-बढ़ा देते हैं। फ़िर् तीनों अरकान् के मुज़ाहिफ़् शकल् हो जायेंगे

फ़ाइलुन् तुन् [ 2122] जिसे हम वज़न् रुक्न् फ़ाइलातुन् [2 122  से बदल् लिया
मुस् तफ़् इलुन् तुन् [2 2 12 2] जिसे हम वज़न् रुक्न् मुस् तफ़् इलातुन् [2 2 12 2  से बदल् लिया
मु त् फ़ा इलुन् तुन् [1 1 2 12 2 ] जिसे हम वज़्न् रुक्न् मु त फ़ा इलातुन् [1 1 2 12 2  ] से बदल् लिया
यह् बह्र् उर्दू शायरी में कोई ख़ास् प्रयोग् में नहीं आती है ..बस् आप् की जानकारी के लिए लिख् दिया है

इस तरह वतद-ए-मज्मुआ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र खत्म हुआ । अब अगली क़िस्त में उन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे जो ’वतद मफ़रूक़ ’ [हरकत+साकिन+हरकत ] पर लगते हैं ।

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछली  क़िस्त के आलेख आप मेरे ब्लाग पर देख सकते हैं 

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रविवार, 1 जनवरी 2017

चिड़िया: वटवृक्ष और जूहीलता

चिड़िया: वटवृक्ष और जूहीलता: वट वृक्ष और जूहीलता ------------------------ गाँव की कच्ची पगडंडी के किनारे बहुत से वृक्ष थे. नीम, पीपल, कनेर, बहुत सारे. पर उनमें खास था...

एक गीत : नए वर्ष की नई सुबह में ---------

सभी मित्रों  ,शुभ चिन्तकों .हितैषियो को , इस अकिंचन का नव वर्ष की शुभकामनाएं ----यह नव वर्ष 2017 आप के जीवन में सुख और समृद्धि लाए
-आनन्द.पाठक और परिवार ----
नए वर्ष की प्रथम भेंट है --
आप सभी  पाठक के सम्मुख........
एक गीत :- नए वर्ष की नई सुबह में....................

नए वर्ष की नई सुबह में ,
आओ मिल कर लिखें कहानी,ना राजा हो  ,ना हो रानी 

जड़ता का हिमखण्ड जमा था 
 शनै : शनै: अब लगा पिघलने
एक हवा ठहरी  ठहरी   सी 
 मन्थर  मन्थर  लगी  है  चलने  
प्राची की किरणों से रच दें
नव विकास  की नई कहानी ,आओ मिल कर लिखें कहानी

सूरज का रथ निकल पड़ा है 
राह रोकने वाले  भी हैं
भ्र्ष्ट धुन्ध की साजिश  मे रत
कुछ काले धन वाले भी है
सृजन करें एक सुखद अनागत
अनाचार की मिटा  निशानी,आओ मिल कर लिखें कहानी

उन्हें अँधेरा ही दिखता है
जहाँ रोशनी की बातें  हैं 
सत्य उन्हें  स्वीकार नही है
पर ’सबूत’ पर चिल्लाते हैं
उन पर हम क्या करें भरोसा
उतर गया  हो जिनका पानी,आओ मिल कर लिखें कहानी

क्षमा दया करुणा से भी हम
स्वागत के नव-गीत लिखेंगे
प्यार लुटाने निकल पड़े हैं
’नफ़रत’ है तो प्रीति लिखेंगे
करें नया संकल्प वरण हम
पुरा संस्कृति  है  दुहरानी ,आओ मिल कर लिखें कहानी

-आनन्द.पाठक--
08800927181